
ऋषिकेश 23 जून
गजेंद्र सिंह
गैरसैंण, उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी में सत्र समापन के बाद विश्व के अनेक देशों से पधारे राजदूतों एवं उच्चायुक्तों का एक प्रतिनिधिमंडल ऋषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन पहुँचा। यह आगमन सांस्कृतिक सौहार्द का प्रतीक है, उत्तराखंड की दिव्य परंपराओं और “वसुधैव कुटुम्बकम्” के दिव्य मंत्रों को विश्वस्तरीय प्रसारित करने का दिव्य माध्यम है परमार्थ गंगा तट।
परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष, स्वामी चिदानन्द सरस्वती और अध्यात्मिक वक्ता साध्वी भगवती सरस्वती के पावन सान्निध्य में राजदूतों और उच्चायुक्तों ने पावन गंगा जी का पूजन, अर्चन और आरती की। परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों ने वेद मंत्रों का उच्चारण कर समस्त वातावरण को शांति, वैश्विक सद्भाव और बंधुत्व की भावनाओं से ओतप्रोत कर दिया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने इस अवसर पर कहा, मां गंगा केवल भारत की नहीं, पूरी मानवता की धरोहर है। जब विश्व के विभिन्न देशों के प्रतिनिधि माँ गंगा की आरती में सहभागी बनते हैं, तब यह एक धरती, एक परिवार की भावना को और सशक्त करता हैराजदूतों ने भी इस अलौकिक अनुभव को अत्यंत आध्यात्मिक और शांतिपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि परमार्थ निकेतन का वातावरण उन्हें “घर से दूर घर” जैसा प्रतीत हुआ और यहाँ की संस्कृति, सेवा और समरसता की भावना प्रेरणादायक है। उन्होंने बड़े ही प्रेमभाव से पूज्य स्वामी जी से भेंट कर अपनी आध्यात्मिक, संस्कृति व दर्शन से संबंधित जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया।
उत्तराखंड की संस्कृति, जिसमें प्रकृति, पर्यावरण और अध्यात्म का सुंदर समन्वय है, ने विश्व मंच पर अपनी सशक्त पहचान बनायी हैं। यह प्रदेश न केवल देवभूमि है, बल्कि “संवेदना की भूमि” भी है, जहाँ से “संवेदनशील विश्व व्यवस्था” की शुरुआत हो सकती है।
इस विशेष अवसर पर अमर राष्ट्रनायक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी के बलिदान दिवस को भी श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया। डॉ. मुखर्जी, जिन्होंने एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे का उद्घोष करते हुए राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी, वे आज भी प्रेरणा के प्रतीक हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा, यदि आज जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल और पंजाब भारत के अभिन्न अंग हैं, तो यह डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी के अद्वितीय योगदान और बलिदान का परिणाम है। उन्होंने अंत्योदय और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को विकास का आधार माना, उनके आदर्शों को आगे बढ़ाते हुये भारत के ऊर्जावान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के निर्माण हेेतु महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
साध्वी भगवती सरस्वती ने भी अपने संबोधन में कहा, “आज की दुनिया को एकता, करुणा और समरसता की सबसे अधिक आवश्यकता है। भारत की संस्कृति, विशेषकर उत्तराखंड की ऋषि परंपरा, इन मूल्यों की जीती-जागती मिसाल है। उन्होंने उच्चायुक्तों व राजदूतों को उत्तराखंड की परम्पराओं, प्रकृति समर्पित पर्वो की विस्तार से जानकारी देते हुये कहा कि जब दुनिया के विभिन्न देश और संस्कृति एक साथ आकर प्रकृति, परमात्मा और परस्पर सौहार्द का पर्व मनाते हैं, तब विश्व में स्थायी शांति और समरसता की स्थापना संभव हो सकती है।
परमार्थ निकेतन की ओर से सभी अंतरराष्ट्रीय मेहमानों को रूद्राक्ष का पौधा, पर्यावरणीय उपहार स्वरूप भेंट किया । आज का यह सुअवसर एक सांस्कृतिक आदान-प्रदान के साथ प्रकृति के प्रति श्रद्धा और सेवा का दिव्य संदेश भी है।
सभी ने मिलकर विश्व के कल्याण, वैश्विक शांति, पर्यावरण की रक्षा और मानवता के उत्थान की सामूहिक प्रार्थना की।
आज जब हम अमर बलिदानी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी के बलिदान दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं, ऐसे में यह वैश्विक बंधुत्व हमें याद दिलाता है कि भारत की आत्मा केवल सीमा में नहीं, संस्कृति में बसती है और जब यह संस्कृति दुनिया से जुड़ती है, तो विश्व ही परिवार बन जाता है।
