
ऋषिकेश 29 मई
गजेंद्र सिंह
भारत के 14वें माननीय राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश में तीन दिवसीय आध्यात्मिक यात्रा के दौरान आज स्वामी चिदानन्द सरस्वती के पावन सान्निध्य में परमार्थ निकेतन में आयोजित 34 दिवसीय श्रीराम कथा में गरिमामयी उपस्थिति रही। यह क्षण आत्मिक चेतना, मूल्यों और मर्यादा की ऊंचाईयों को छूने वाला एक अद्भुत अवसर था।
पावन गंगा तट पर स्थित परमार्थ निकेतन के दिव्य वातावरण में कोविंद का आगमन राष्ट्र सेवा से आत्म सेवा की यात्रा का दिव्य प्रतीक है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने श्रीराम जी को अध्यात्म का एवरेस्ट बताते हुए कहा कि जैसे एवेरेस्ट पृथ्वी की भौगोलिक ऊँचाई है, वैसे ही श्रीराम जी जीवन मूल्यों, सेवा, सत्य, संकल्प और त्याग की आध्यात्मिक ऊँचाई हैं। श्रीराम मर्यादा के प्रतीक हैं, और आज भारत को ऐसे ही आदर्शों की सबसे अधिक आवश्यकता है।
स्वामी जी ने कहा, एवरेस्ट, भारत का रक्षक है, उसकी ऊँचाई हमें प्रेरणा देती है कि केवल पर्वतों की ऊँचाई नहीं, बल्कि जीवन की ऊँचाई भी साधनी चाहिए, जहाँ विचार शुद्ध हों, हृदय विशाल हो और कर्म कल्याणकारी हों और श्रीराम जी के आदर्श हमारे जीवन को उसी दिशा में ले जाते हैं।
स्वामी जी ने कहा कि आज अंतरराष्ट्रीय माउंट एवरेस्ट दिवस है, यह एक ऐसा अवसर जो हमें जीवन की भौतिक और आध्यात्मिक ऊँचाइयों को साधने की प्रेरणा देता है। यह केवल पर्वतारोहण का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन में ऊँचाइयाँ प्राप्त करने की भावना का भी प्रतीक है।
स्वामी जी ने कहा कि श्रीराम जी की कथा राष्ट्रीय और वैश्विक चेतना के जागरण की गाथा है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी के जीवन से प्रेरणा लेकर हम जीवन रूपी एवरेस्ट जैसे ऊँचे आदर्शों की ओर अग्रसर हो सकते हैं। उन्होंने कहा हम केवल एवरेस्ट की ही ऊँचाइयों को न नापें, बल्कि अपने भीतर भी उस ऊँचाई को जगाएं, जहाँ सेवा, संस्कार और संतुलन हो। एवरेस्ट पर्वत केवल ऊँचाई का प्रतीक नहीं है, वह हमें जीवन की ऊँचाई, सच्चाई और सफाई का संदेश देता है और श्रीराम जी अध्यात्म के एवरेस्ट हैं तथा रामायण केवल एक ग्रंथ नहीं, हमारे जीवन का पथप्रदर्शक हैं।
स्वामीजी ने कहा, आज की युवा पीढ़ी को चाहिए कि वे श्रीराम जी की तरह अपने भीतर को पहचानें, अपनी क्षमताओं पर विश्वास करें और पर्यावरण, संस्कृति और सेवा के पथ पर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ें।
श्री कोविंद जी ने कहा कि परमार्थ निकेतन आकर यह अनुभव होता है कि भारत की आत्मा अब भी उसके गांवों, तीर्थ स्थलों और प्राकृतिक सौन्दर्य, नदियों की निर्मलता में, संतों की वाणी में, और सेवा की भावना में जीवंत है। यह 34 दिवसीय मानस कथा भारत के सांस्कृतिक और नैतिक पुनरुत्थान का एक अद्भुत अभियान है। श्रीराम कथा एक दिशा है तथा जीवन को मर्यादा, सेवा, सत्य और धैर्य की राह पर ले जाने की प्रेरणा है। कथा को श्रवण करने वाले वास्तव में राष्ट्रनिर्माता हैं। राम कथा अपने आप में गूढ़ गं्रथ है, उसकी कहानी ऐसा लगता है जैसे ये हमारे अपने जीवन की कहानी है। श्रीराम कथा हमें जीवन के हर द्वंद से हमें बाहर निकाल सकती है। रामायण के सभी पात्र हमें अद्भुत शिक्षा देते हैं और लोक हित के लिये तो प्रभु श्री राम की हर युग में आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान युग में हम सभी विश्व युद्ध की कगार पर खड़े है, पूरे विश्व में एक द्वंद चल रहा है। हर युग में ब्रह्मण्ड में दो शक्ति सदैव सक्रिय रहती है एक है असुरी और दूसरी दैवीय परन्तु हमें सदैव ही दैवीय शक्ति को आगे बढ़ाना होगा।
श्रीरामचरितमानस के अरण्य कांड की यह चैपाई कर्म प्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा मेरी प्रेरणा का स्रोत है। उन्होंने कहा कि हम इस संसार को जो देते है वही हमें प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा कि माँ गंगा के तट पर श्रीराम जी की कथा सुनना, स्वामीजी का सान्निध्य होना और प्रकृति की गोद में यह सब अनुभव करना, मेरे लिए अत्यंत भावुक, प्रेरक और अविस्मरणीय है। मानस एक ऐसी विरासत है जो भारत को जोड़ती है, जागरूक बनाती है और संस्कार देती है।
स्वामी जी ने आज के श्रीराम कथा यजमानों को रूद्राक्ष का पौधा भेंट कर हरित कथा, पर्व और उत्सव मनाने का संकल्प कराया।
संत श्री मुरलीधर जी के श्रीमुख से प्रवाहित हो रही मानस ज्ञान गंगा में आज भारत के विभिन्न राज्यों से आये विभिन्न धर्मों के धर्मगुरूओं की गरिममायी उपस्थिति रही। सभी ने आज शौर्य, स्वाभिमान और स्वराज्य के प्रतीक महाराणा प्रताप जी 485 वीं जयंती पर भावभीनी श्रद्धाजंलि अर्पित की।
